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Likhna Bha Gaya . . . .

It is my personal poem. It gives an insight of my journey of “kalam aur mai”.

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Posted by on June 16, 2012 in poetry

 

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भव्य की भव्य रास

 
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Posted by on April 18, 2018 in Uncategorized

 

नादान ज़माना समझे न

शिकार को नही शिकारी को मारो

नारी को नही बलात्कारी को मारो

 
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Posted by on April 15, 2018 in Uncategorized

 

तेरी रुहानी नैन

तेरी नैना देते चैना

सकून भी जुनून भी

दीदारे रुह की तलब है

हर पल यारा दिन रैना

 

 

 

 

 
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Posted by on April 4, 2018 in Uncategorized

 

बनूं कुछ ऐसा !

दरद की मिली हो जिसको सजा

बनूं उसकी मुस्कराहट की वजह

ऐ खुदा ! ऐसी ही कुछ कला दे दे

किसी की डूबी नैया लगा दूं पार

ऐसा फ़न, हौंसला ,ऐसा मल्लाह दे दे

उम्मीदें बन सकूं हर दरदे दिल की

ऐसी अदा -वफा , तू दुआ दे दे

 

तू नही जानता

तू नही जानता तूने क्या सौगात दी है

पड़ी थी कलम मेरी छुपी दुबकी

मेहरबां तूने ही तो जुबां दी है

जब चाहे सिजदा करूं

जब चाहे शिकवा करुं

रूहानी कलम थमाई दाता

करामाती दवात साथ दी है

 
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Posted by on March 12, 2018 in poetry

 

तू मैं ही तो हूं

मैं भी नारी तू भी नारी

तुझको भी परवाज पसंद है

मुझे भी है पसंद उडारी

तेरे सपने है मेरे सपने

तेरे अपने है मेरे अपने

तू भी है अंश किसी का

तुझको अपना अंश दिया है

अंश – अंश तुम मिल महकाना

इक नये अंश की फुलवारी

उड़ने को खूब पंख मिलेंगे

जीत पे विजय के शंख मिलेंगे

भरो चाहे आकाश आगोश में

जमीं पे रहे बस नजर तुम्हारी

 
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Posted by on March 10, 2018 in poetry

 

क्यूं करूं ?

राजी रहता जब रब , राजी रहते हैं सब

फिर खुद को खुदा से मैं जुदा क्यूं करू ?

 
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Posted by on January 24, 2018 in poetry