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गऊ समान कन्या

21 Oct

नवरात्रा के उपलक्ष्य में बेटियाँ बचाने की शपथ ही सच्चा पूजन है .

करते है जिसकी डोली विदा, रक्त उस का बहाना न चाहिए

कन्या तो गऊ समान है, वध उस का करना न चाहिए

तुम भी तो किसी की  बेटी हो, फिर क्यों सुख की तुम सांस भरो ?

छीन सांसें बेटी के हक की, पाप सर पे चढ़ाना न चाहिए

करते है जिसकी डोली विदा, लहू उस का बहाना न चाहिए

ज़रा सोच करो द्रिष्टि धर के, न काटो सृष्टि को जड़ से

कर कन्या हत्या-एक नीच कर्म, जन्म अपना गवाना न चाहिए

पढले बेटी तभी चेहरा, बेटी हर मन की बात सुने

चले वंश बस बेटे से, इस भ्रम में आना न चाहिए

करते है जिसकी डोली विदा, रक्त उस का बहाना न चाहिए

बेशक न जिमाओ, तुम कंजक, न पूजो चाहे कोई देवी

अपने घर आती कन्या को, मृत्युद्वार दिखाना न चाहिए

करते है जिसकी डोली विदा, लहू उसका बहाना न चाहिए . .

रजनी विजय सिंगला, यह गुज़ारिश करती है . .

 
6 Comments

Posted by on October 21, 2012 in poetry

 

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6 responses to “गऊ समान कन्या

  1. GULSHAN VARSHNEY

    April 24, 2014 at 10:02 AM

    nice lines.
    humnein bhi bhrun hatya ke virodh mein ek song banaya hai.ummed hai kisi ka to man badlega. link bhej raha hoon .repely ka intjar rahega….ise age barane mein help karien.thanx.

     
  2. GULSHAN VARSHNEY

    April 24, 2014 at 10:07 AM

    thanx! repely must.

     
  3. rajnivijaysingla

    March 29, 2015 at 11:29 AM

    Reblogged this on Hindi Poetry World and commented:
    कुछ तो सोच जमाने
    ओ बेटों के दीवाने

     

thank you.

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