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bate nahi karenge berha par

08 Mar

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1 Comment

Posted by on March 8, 2014 in poetry

 

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One response to “bate nahi karenge berha par

  1. MANAN SINGH

    March 19, 2014 at 3:33 PM

    प्रकाशन हेतु एक कविता प्रेषित है :

    *ख़्वाहिश*
    किसीने कहा था कि मंदिर का पुजारी फूल तोड़ लेता है ,
    खाली टहनी -पात छोड़ देता है ।
    पूजा हो उसकी पूरी ,
    फिर तो मुँह मोड़ लेता है ।
    आज मंदिर में भी यही मंजर था ,
    कुछ फूल थे बिखरे , कुछ थे मर्दित भी ।
    कुछ थे इतराते कि देख ! हम तो
    देवों के सिर पर भी चढ़ जाते ।
    डाल पर निहाल फूल बोला , ‘ अरे ! इतना न इतराते ,
    अब झाड़ -बुहार कर तेरी सबकी इहलीला बस समझो तमाम ,
    और मैं तो सदा अपने माली(पुजारी) की उम्मीदों पर खड़ी हूँ ,
    तूने क्या समझा कि ऐसे ही यहाँ पड़ी हूँ ?
    मेरा माली पल -पल मुझे निहारता गुमान देता कि मैं उसकी हूँ ,
    वह मेरा है , मेरे रूप का चितेरा है,
    गुमान का गर्व है ।
    और मैं गर्वित और समर्पित कि मैं अपने माली की हूँ ,
    रहूँगी और सदा कहूँगी कि
    बनी रहे फूल और माली की बंदगी !
    यही मेरी जिंदगी !
    बस यही मेरी जिंदगी !!

    ***

     

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