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वक्त वक्त की बात

23 Jan

कभी हंसाता , कभी रुलाता
कभी थमाता , कभी भगाता
वक्त पे चले न जोर किसी का
जोर अपना ही दिखाता वक्त
देते हैं जो दरद हम ओरो को
सूद समेत लौटाता है वक्त
करम का पहिया चलाये वक्त
वक्त आने पे इंसाफ कराये वक्त
वक्त मेहरबां तो जिंदगी रोशन
अपने खाते ही करवाते शोषण
चाहना तो नही कोई भी गंवाना
वक्त की मरजी, वक्त का नजराना

किसको है हंसाना किसको रूलाना

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Posted by on January 23, 2018 in poetry

 

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