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Category Archives: शिकारा by Vidhu Vinod chopra

अपनों के तीर

अपनों के तीर

अपने जब दरद देते इन्तेहा
पराये तब ये कहते हंसके हम पे
बेहद नाज करते थे तुम जिन पे


आज वही जुबां खामोश रुह घायल
मन का भिगो गये कोना – कोना ।

अश्क छुपाले और छुपाले रोना

किसको दिखायेगा दरद को ढोना ?

 

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( शिकारे) शिकार हो गये

( शिकारे) शिकार हो गये

जन्नत ऐ कश्मीर ! क्यूं किया हमें जहुन्नम के हवाले ?सियासियों को कहो,” इक रात संग (तंबू ) मे तो निकाले।”

 

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