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Category Archives: बुढ़ापा बड़ा बेदरद

अपनों के तीर

अपनों के तीर

अपने जब दरद देते इन्तेहा
पराये तब ये कहते हंसके हम पे
बेहद नाज करते थे तुम जिन पे


आज वही जुबां खामोश रुह घायल
मन का भिगो गये कोना – कोना ।

अश्क छुपाले और छुपाले रोना

किसको दिखायेगा दरद को ढोना ?

 

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कभी याद हमे भी करना # पुलवामा

कभी याद हमे भी करना # पुलवामा

 

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Cry for life

 

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बेटे नही करेंगे बेड़ा पार

 

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काश ! भूख न होती

पापी पेट के लिए करता हूं
आज का तो हुआ इंतजाम
कल के लिए हरदम डरता हुं
तपते तन, सहमे डरे मन से
नागा कभी कभी करता हुं
भुख से करनी पड़ती मुलाकात
जाडे़ में जब -जब ठिठुरता हुं
https://hindipoetryworld.wordpress.com/2018/05/01/%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a4%ac%e0%a5%82%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80/

 

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बायनाः ढाई अक्षर प्रेम का काफी है

बायनाः ढाई अक्षर प्रेम का काफी है

सास भी कभी बहू ही थी

कल की बहू ,आज सासु रानी

घर घर की है यही कहानी

यह रीत तो सदियों पुरानी

करवा चौथ देखो दोनो मनाती

मेंहदी रचाती, चूड़ी खनकाती

सुहाग के गीत गाती

तारो की घनी छाँव मे

दोनों ने बड़े ही चाव मे

खाई करवे का गरी सरगी

शाम सुनाई सासु ने करवे की कहानी

बायने की थाली सजा के लाई बहूरानी

पाँव छूकर बायना देवे बहूरानी

गले लगाके बड़े आस से

बहू से यह कहा ,सास ने:

( मेरे लाल की तू लालिमा

मेरे चाँद की तू है चांदनी

उसकी मल्लिका, उसकी रानी

बायने मे चाहिए केवल ,बिटिया रानी!

बस ढाई अक्षर प्रेम के ,गृहलक्ष्मी !तू सुहानी !

ढाई अक्षर प्रेम के

ढाई अक्षर प्रेम के

काफी है ,काफी है

जिंदगी प्यार की

मुस्कान व दुलार की

काफी है, काफी है

क्योंकि (प्यार ) होता है जंहा

( मिठास )आ जाती है वंहा

प्यार ही काफी है ,काफी है।

 

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दरद देखा नही जाता

किसी की बदनसीबी पे ।
कमी, मजबूरी व गरीबी पे।
कभी देख के बेरोजगारी।
कभी भूख,कभी बीमारी।
कभी मौत ,  कंही सौत
तिल-तिल जीने की लाचारी ।
देख रुक जाते हैं कदम।
रोती अखियां ,हा़ए! इतने गम ।
मेरी मान, जग गमे आजाद कर।
खुशियो की तू इतनी बरसात कर ।
भीग जाये  खुदा! तेरी  खुदाई ।
मिट जाये गम,  अश्क व जुदाई

 

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भाभी मां मानो तो

मायके की तो बात निराली।
बेटियां होताी हैैं खुशहाली।
लेते ही सर सुहाग चुनरिया।
पराई हो जाती बाबुल अटरिया।
माना मायका मां संग भाता।
भाई-  भाभी भी मीठा नाता।
आदर देने से अटूट बन जाता।
पर मां बाप ताउमर न रहते।
भाई – भाभी ही तब साथ देते।
बेटियां रानी अपने राजा की।
भाभी मायके का नूर होती ।
भाई की वो हूर – गरुर होती।
पहल कर दो सदाये – दुआए ।
जरुरत बाद में  है जरुर होती।
जरुरत पड़े पर जो ननद बोले।
कड़वाहट रिश्तों में वो घोले।
मतलबी  फितरत की उमर छोटी ।
प्यार  उड़ा दे  वो हौले – हौले।
शुरु से रिश्ता  को मधुर बनाये ।
  दुआए देकर  ही  आती दुआए ।

 

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क्युं बोलती ये निगाहे ?

अखियां बोलती है बस पढ़ना अाना चाहिये ।
हमारी तो निगाहे ही है अाईना दिल का ।
जमाने को राज छिपाने में अाता है लुत्फ ।
हमारा तो छिपाने से उड़ जाता है लुत्फ ।
तू ही बता, जमाने! सिखा दे राज छिपाने ।
हम तो मान जाये पर न मानती ये निगाहे।
राज ऐ दिल को नजरो में दे देती ये पनाहे ।
मासूम दिल की भी न सुने ये जुल्मी निगाहे ।
कसूर निगाहो को पर पाते हैं हम सजा़ये ।

 

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सूरत पे सीरत भारी

सूरत होती क्या ? जमाना जिसपे फिदा
चार दिन की चांदनी ,चार दिन की  माया
दीवानी  है दुनिया , सब को है भरमाया
सीरत को भूला जग , सूरत पे है ललचाया
न थी सूरत वैसी ,जमाना दे दाद, उस जैसी
अकसर मिलने लगे खंजर से ताने
सूरत बदलना न था हाथ में अपने
दिखा दिये रुह को सीरत के सपने
सीरत का सपना ही कर लिया साकार
मिल रहा उसी रोज से ऐ ! जमाने तेरा प्यार
तभी तो कहता है अपुन का दिल बारम्बार
सूरत न बस में तो सीरत ही बदल लो यार

 

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बेजुबान हुं पर गुमराह नही

मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नही ।
मैं तो वक्त को तवज्जो देता हूं ।
दरद जमाने तेरे सारे मैं सहता हूं ।
कुछ कहना गर बस उसे कहता हूं ।
जो फैसले वक्त ही तय करता है ।
जाने बंदा उसमे क्यूं अड़ता है ?
मेरी खामोशी की वजह क्या है ?
क्योंकि जाने वो ही, रज़ा क्या है ?
बंदे की औकात कंहा न्याय सुनाने की ।
नेकी – बदी पर मुहरें अपनी लगाने की ।
कथनी-करनी के फल, रब के हाथ सारे ।
कल आज व कल , वो ! बिगाड़े या संवारे ।
नैया थमा दो उसको ,वो ही तारे वो उबारे ।
क्युं बदजुबानी ? जब वक्त जवाब दे सारे

 

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कमी की कीमत

दाने की कीमत  भूखा  ही जाने ।
प्यास की कदर, प्यासा पहचाने ।
प्यार   के क्या मोल है होता ?
दरद सहा हो , सहे हो जिसने ताने
राजसी लोग फुटपाथ से अनजाने
भरे-पूरे  क्या त्याग -रहम को  माने
वैभव तले रौंदे रोज गरीब के दाने

 

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सूरत बनाम सीरत

सूरत चले जवानी तक सीरत चले बाद भी
मोम सा दिल बना ले याद रखे फौलाद भी

 

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मां के क्या कहने, रब्बा !

मा की क्या रीस करेगा तू जमाने।
मां ही तो दे सांसो के खजाने।
दरद करती सब अपने हिस्से।
इतिहास गवाह है, महान है किस्से ।
मां तो बस देना ही देना जाने ।
औलाद की खातिर सह ले ताने ।
दरद में भी रहकर , है दुआए देती ।
औलाद के खंजर ,चुपचाप है सहती।
ममता का मोती ,शीतल सी ज्योति
बालक कलयुगी हो जाये कितने बेशक
मां सदा पावनी सतयुगी गंगा सी बहती

 

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बेटियां रहमत रब की

बेटियां रहमत रब की
इनको न जहमत माने
ताउमर रहती अपनी
इनको न पराई जाने
पालना के पंख लगाओ
जी जान से इन्हे पढ़ाओ
बहुत चला ली ऐ ; तूने जमाने
कभी कर शोषण ,कभी दे देे ताने
अब तो कर ले ,तू भी तौबा
रब की नेमत को कर नमन !
कलियो से ही खिलता चमन
बेटियां होती दुआओं जैसी
बरकत की सदाओ जैसी
महकती दिशाओं जैसी
बेटियों से सजा लो आशियाना अपना
साकार करो मासूम अंखियों का सपना
सच्ची यही कंजक पूजा, तप ,नाम जपना

Rajni Vijay Singla

 

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