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Category Archives: badhai

बायनाः ढाई अक्षर प्रेम का काफी है

बायनाः ढाई अक्षर प्रेम का काफी है

सास भी कभी बहू ही थी

कल की बहू ,आज सासु रानी

घर घर की है यही कहानी

यह रीत तो सदियों पुरानी

करवा चौथ देखो दोनो मनाती

मेंहदी रचाती, चूड़ी खनकाती

सुहाग के गीत गाती

तारो की घनी छाँव मे

दोनों ने बड़े ही चाव मे

खाई करवे का गरी सरगी

शाम सुनाई सासु ने करवे की कहानी

बायने की थाली सजा के लाई बहूरानी

पाँव छूकर बायना देवे बहूरानी

गले लगाके बड़े आस से

बहू से यह कहा ,सास ने:

( मेरे लाल की तू लालिमा

मेरे चाँद की तू है चांदनी

उसकी मल्लिका, उसकी रानी

बायने मे चाहिए केवल ,बिटिया रानी!

बस ढाई अक्षर प्रेम के ,गृहलक्ष्मी !तू सुहानी !

ढाई अक्षर प्रेम के

ढाई अक्षर प्रेम के

काफी है ,काफी है

जिंदगी प्यार की

मुस्कान व दुलार की

काफी है, काफी है

क्योंकि (प्यार ) होता है जंहा

( मिठास )आ जाती है वंहा

प्यार ही काफी है ,काफी है।

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उफ ! ये मुस्कान तौबा

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मुस्कान की कोई उमर न होती।
न मजहब, ऱुत न कोई जात ।
मुस्कान बिखेरती मस्त बहारें ।
कशमीर  सी  कंचन कायनात ।
मुस्कान न मांगे कुबेर खजाने ।
मुस्कान के बदले बस मुस्कराहट ।

 

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मुबारक मुबारक मुबारक

मुबारक !मुबारक! मुबारक!मुबारक ।
भक्त को भगवान का दुलार मुबारक ।
भूखे को रोटी,  अधनंगे को कपड़ा
प्यासे को पानी की धार मुबारक ।
खेतों को बरखा की बहार मुबारक ।
दिल को प्यार का इज़हार मुबारक । 
सरहदों को अमन ऐ एतबार मुबारक ।
राही को मंजिल की पुकार मुबारक ।
योद्धा को धनुष – तलवार मुबारक ।
जंगलो को हरियल सा हार मुबारक ।
मुसाफिर को पेड़ की छांव मुबारक । 
भारत को स्वच्छता का पैगाम मुबारक ।
किसान को अनाज का दाम मुबारक ।
पंछी को अपना दाना-पानी मुबारक ।
बचपन को नानी की कहानी मुबारक ।
मरते को स्वस्थ जिंदगानी मुबारक ।
सुबह के भूले को  है शाम मुबारक ।
आंचल मे बेटी,  हर अंगना में पौधे ,
मां भारती को ऐसी शान मुबारक ।

 

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भाभी मां मानो तो

मायके की तो बात निराली।
बेटियां होताी हैैं खुशहाली।
लेते ही सर सुहाग चुनरिया।
पराई हो जाती बाबुल अटरिया।
माना मायका मां संग भाता।
भाई-  भाभी भी मीठा नाता।
आदर देने से अटूट बन जाता।
पर मां बाप ताउमर न रहते।
भाई – भाभी ही तब साथ देते।
बेटियां रानी अपने राजा की।
भाभी मायके का नूर होती ।
भाई की वो हूर – गरुर होती।
पहल कर दो सदाये – दुआए ।
जरुरत बाद में  है जरुर होती।
जरुरत पड़े पर जो ननद बोले।
कड़वाहट रिश्तों में वो घोले।
मतलबी  फितरत की उमर छोटी ।
प्यार  उड़ा दे  वो हौले – हौले।
शुरु से रिश्ता  को मधुर बनाये ।
  दुआए देकर  ही  आती दुआए ।

 

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वो बचपन प्यारा

आजकल कपड़े के थेलै में साग सब्जी व कागज के लिफाफे में समोसे – जलेबी पाकर बचपन फिर  से  लौट आया ।
Welcome Ecofriendly !
Polybags free, Jalandhar

 

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भारतीय कला लाजवाब है | Hindi Poetry World

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मां ! ममता व कलम सब गज़ब है

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