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Category Archives: urdu nazam

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सूरत पे सीरत भारी

सूरत होती क्या ? जमाना जिसपे फिदा
चार दिन की चांदनी ,चार दिन की  माया
दीवानी  है दुनिया , सब को है भरमाया
सीरत को भूला जग , सूरत पे है ललचाया
न थी सूरत वैसी ,जमाना दे दाद, उस जैसी
अकसर मिलने लगे खंजर से ताने
सूरत बदलना न था हाथ में अपने
दिखा दिये रुह को सीरत के सपने
सीरत का सपना ही कर लिया साकार
मिल रहा उसी रोज से ऐ ! जमाने तेरा प्यार
तभी तो कहता है अपुन का दिल बारम्बार
सूरत न बस में तो सीरत ही बदल लो यार

 

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बेजुबान हुं पर गुमराह नही

मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नही ।
मैं तो वक्त को तवज्जो देता हूं ।
दरद जमाने तेरे सारे मैं सहता हूं ।
कुछ कहना गर बस उसे कहता हूं ।
जो फैसले वक्त ही तय करता है ।
जाने बंदा उसमे क्यूं अड़ता है ?
मेरी खामोशी की वजह क्या है ?
क्योंकि जाने वो ही, रज़ा क्या है ?
बंदे की औकात कंहा न्याय सुनाने की ।
नेकी – बदी पर मुहरें अपनी लगाने की ।
कथनी-करनी के फल, रब के हाथ सारे ।
कल आज व कल , वो ! बिगाड़े या संवारे ।
नैया थमा दो उसको ,वो ही तारे वो उबारे ।
क्युं बदजुबानी ? जब वक्त जवाब दे सारे

 

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मां की दुआए कबूल कर ले

  दरद के सब पहाड़ पल में ही तू धूल  कर दे ।
चुभने से पहले ही हर शूल को तू फूल कर दे।
बुलंदियो में, हे रब्बा ! बच्चे  तू मशगूल कर दे।
हर तमन्ना ,हर दुआ, हर  मां की कबूल कर दे ।
उनकी मासूम गलतियां भूलने की भूल कर दे ।
मदर डे पे, मां सा ही खुद को मशहूर कर दे ।

 

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मां की दुआए कबूल कर दे

  दरद के पहाड़ सब पल में ही तू धूल  कर दे ।
चुभने से पहले ही हर शूल को तू फूल कर दे।
बुलंदियो में, हे रब्बा ! बच्चे  तू मशगूल कर दे।
हर तमन्ना ,हर दुआ, हर  मां की कबूल कर दे ।
उनकी मासूम गलतियां भूलने की भूल कर दे ।
मदर डे पे, खुदा खुद को इतना मशहूर कर दे ।

 

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कमी की कीमत

दाने की कीमत  भूखा  ही जाने ।
प्यास की कदर, प्यासा पहचाने ।
प्यार   के क्या मोल है होता ?
दरद सहा हो , सहे हो जिसने ताने
राजसी लोग फुटपाथ से अनजाने
भरे-पूरे  क्या त्याग -रहम को  माने
वैभव तले रौंदे रोज गरीब के दाने

 

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मां के क्या कहने, रब्बा !

मा की क्या रीस करेगा तू जमाने।
मां ही तो दे सांसो के खजाने।
दरद करती सब अपने हिस्से।
इतिहास गवाह है, महान है किस्से ।
मां तो बस देना ही देना जाने ।
औलाद की खातिर सह ले ताने ।
दरद में भी रहकर , है दुआए देती ।
औलाद के खंजर ,चुपचाप है सहती।
ममता का मोती ,शीतल सी ज्योति
बालक कलयुगी हो जाये कितने बेशक
मां सदा पावनी सतयुगी गंगा सी बहती

 

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क्या होती खुशनसीबी ?

दरद देखा करीब से शमशान -अस्पताल में
क्या – क्या देखा, बस कहा न जाये
भूख की आग, कहर कितना ?कैसे कैसे ढाये फैले हाथ, बिलखता बचपन, मजबुर जवानी
दुत्कारा बुढ़ापा, छुपा दरद, सिसकते साये
अश्क भी तौबा कर ले, गम इतना सताये
जहुन्नम ऐ नजारा इसी जमीं पे ही दिखाये
हर नेमत के होते जो रब को दे सौ लानते
खुशनसीबी उसकी , चौखट ही छोड़ जाये
मनजीत जगजीते ही खुशनसीब कहलाये
दरद मे करे अरदास,सुख में शुकराना गाये
खुशियां उसको खुद ही आवाज लगाये

 

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