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उफ ! ये मुस्कान तौबा

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मुस्कान की कोई उमर न होती।
न मजहब, ऱुत न कोई जात ।
मुस्कान बिखेरती मस्त बहारें ।
कशमीर  सी  कंचन कायनात ।
मुस्कान न मांगे कुबेर खजाने ।
मुस्कान के बदले बस मुस्कराहट ।

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बात पते की

अपनापन जता के कोई अपना नही बनता ।
वो तो सच्चाई, सादगी व संस्कार बेबस कर देते है , अपना बनाने के लिए ,ये सदगुण हैं गर तो सब जग अपना ही अपना ।

 

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मुबारक मुबारक मुबारक

मुबारक !मुबारक! मुबारक!मुबारक ।
भक्त को भगवान का दुलार मुबारक ।
भूखे को रोटी,  अधनंगे को कपड़ा
प्यासे को पानी की धार मुबारक ।
खेतों को बरखा की बहार मुबारक ।
दिल को प्यार का इज़हार मुबारक । 
सरहदों को अमन ऐ एतबार मुबारक ।
राही को मंजिल की पुकार मुबारक ।
योद्धा को धनुष – तलवार मुबारक ।
जंगलो को हरियल सा हार मुबारक ।
मुसाफिर को पेड़ की छांव मुबारक । 
भारत को स्वच्छता का पैगाम मुबारक ।
किसान को अनाज का दाम मुबारक ।
पंछी को अपना दाना-पानी मुबारक ।
बचपन को नानी की कहानी मुबारक ।
मरते को स्वस्थ जिंदगानी मुबारक ।
सुबह के भूले को  है शाम मुबारक ।
आंचल मे बेटी,  हर अंगना में पौधे ,
मां भारती को ऐसी शान मुबारक ।

 

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दरद देखा नही जाता

किसी की बदनसीबी पे ।
कमी, मजबूरी व गरीबी पे।
कभी देख के बेरोजगारी।
कभी भूख,कभी बीमारी।
कभी मौत ,  कंही सौत
तिल-तिल जीने की लाचारी ।
देख रुक जाते हैं कदम।
रोती अखियां ,हा़ए! इतने गम ।
मेरी मान, जग गमे आजाद कर।
खुशियो की तू इतनी बरसात कर ।
भीग जाये  खुदा! तेरी  खुदाई ।
मिट जाये गम,  अश्क व जुदाई

 

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भाभी मां मानो तो

मायके की तो बात निराली।
बेटियां होताी हैैं खुशहाली।
लेते ही सर सुहाग चुनरिया।
पराई हो जाती बाबुल अटरिया।
माना मायका मां संग भाता।
भाई-  भाभी भी मीठा नाता।
आदर देने से अटूट बन जाता।
पर मां बाप ताउमर न रहते।
भाई – भाभी ही तब साथ देते।
बेटियां रानी अपने राजा की।
भाभी मायके का नूर होती ।
भाई की वो हूर – गरुर होती।
पहल कर दो सदाये – दुआए ।
जरुरत बाद में  है जरुर होती।
जरुरत पड़े पर जो ननद बोले।
कड़वाहट रिश्तों में वो घोले।
मतलबी  फितरत की उमर छोटी ।
प्यार  उड़ा दे  वो हौले – हौले।
शुरु से रिश्ता  को मधुर बनाये ।
  दुआए देकर  ही  आती दुआए ।

 

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जब तन में तकलीफ ,मन में डर समाने लगे ।
वास्तु- ज्योतिष ,दबे पांव घर मेरे में आने लगे ।
देख के टेवा उपाय कई तरह के समझाने लगे ।
दिशाहीन ? दिशाओं के मायने  समझाने लगे ।
हम भी झांसे में  रज्ज- रज्ज के आने लगे  ।
रब मान बैठे उन्हें , रब को हम भूलाने लगे ।
हिसाब से उनके ही खुद को चलाने लगे ।
नाही तन न मन मिला,बहाने वो बनाने लगे।
पैसा फूंक के भी जब हाथ न आया कुछ ।
रब से ऊंचे माने बैठे जिन्हे लगने लगे तुच्छ ।
न सुख में शुकराना दरद वेले अरदास कीती ।तांही रब ने बन पारखी, सच्चाई समझा दीती ।
परमात्म परमज्योतिष !गल्ल पल्ले पा दीती  ।

परमात्म ही परम ज्योतिष

 

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क्युं बोलती ये निगाहे ?

अखियां बोलती है बस पढ़ना अाना चाहिये ।
हमारी तो निगाहे ही है अाईना दिल का ।
जमाने को राज छिपाने में अाता है लुत्फ ।
हमारा तो छिपाने से उड़ जाता है लुत्फ ।
तू ही बता, जमाने! सिखा दे राज छिपाने ।
हम तो मान जाये पर न मानती ये निगाहे।
राज ऐ दिल को नजरो में दे देती ये पनाहे ।
मासूम दिल की भी न सुने ये जुल्मी निगाहे ।
कसूर निगाहो को पर पाते हैं हम सजा़ये ।

 

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