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Category Archives: Tributes

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जब तन में तकलीफ ,मन में डर समाने लगे ।
वास्तु- ज्योतिष ,दबे पांव घर मेरे में आने लगे ।
देख के टेवा उपाय कई तरह के समझाने लगे ।
दिशाहीन ? दिशाओं के मायने  समझाने लगे ।
हम भी झांसे में  रज्ज- रज्ज के आने लगे  ।
रब मान बैठे उन्हें , रब को हम भूलाने लगे ।
हिसाब से उनके ही खुद को चलाने लगे ।
नाही तन न मन मिला,बहाने वो बनाने लगे।
पैसा फूंक के भी जब हाथ न आया कुछ ।
रब से ऊंचे माने बैठे जिन्हे लगने लगे तुच्छ ।
न सुख में शुकराना दरद वेले अरदास कीती ।तांही रब ने बन पारखी, सच्चाई समझा दीती ।
परमात्म परमज्योतिष !गल्ल पल्ले पा दीती  ।

परमात्म ही परम ज्योतिष

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कमी की कीमत

दाने की कीमत  भूखा  ही जाने ।
प्यास की कदर, प्यासा पहचाने ।
प्यार   के क्या मोल है होता ?
दरद सहा हो , सहे हो जिसने ताने
राजसी लोग फुटपाथ से अनजाने
भरे-पूरे  क्या त्याग -रहम को  माने
वैभव तले रौंदे रोज गरीब के दाने

 

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मां के क्या कहने, रब्बा !

मा की क्या रीस करेगा तू जमाने।
मां ही तो दे सांसो के खजाने।
दरद करती सब अपने हिस्से।
इतिहास गवाह है, महान है किस्से ।
मां तो बस देना ही देना जाने ।
औलाद की खातिर सह ले ताने ।
दरद में भी रहकर , है दुआए देती ।
औलाद के खंजर ,चुपचाप है सहती।
ममता का मोती ,शीतल सी ज्योति
बालक कलयुगी हो जाये कितने बेशक
मां सदा पावनी सतयुगी गंगा सी बहती

 

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दरद से निजात

खुदा ही केवल दरद से निजात दे सकता है
दुआए ,दरद को काफी हद कम कर सकती है
खुदा की बंदगी,, बंदे को हौंसले दे सकती है खुदा के इंसाफ में बस विश्वास बनाये रखे
दरद रफ्ता-रफ्ता रफूचक्कर हो ही जायेगा
खुदा के बेहद करीब ले जायेगा तोहे बंदे
खुद ब खुद छुट जायेगे माड़े सब धंधे

 

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क्या होती खुशनसीबी ?

दरद देखा करीब से शमशान -अस्पताल में
क्या – क्या देखा, बस कहा न जाये
भूख की आग, कहर कितना ?कैसे कैसे ढाये फैले हाथ, बिलखता बचपन, मजबुर जवानी
दुत्कारा बुढ़ापा, छुपा दरद, सिसकते साये
अश्क भी तौबा कर ले, गम इतना सताये
जहुन्नम ऐ नजारा इसी जमीं पे ही दिखाये
हर नेमत के होते जो रब को दे सौ लानते
खुशनसीबी उसकी , चौखट ही छोड़ जाये
मनजीत जगजीते ही खुशनसीब कहलाये
दरद मे करे अरदास,सुख में शुकराना गाये
खुशियां उसको खुद ही आवाज लगाये

 

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पूरब हो या पशिचम दरद है होता

दिशाहीन जमाने हैवानियत का सफर सदा दरद ही देता है इसलिए  अपनी राहें  मानवता की ओर मोड़ ले क्योंकि प्यार बांटने से दुआऐ दस्तक देती है , बददुआऐ के बीज जहरीले ही होते हैं चाहे पूरब में उगाओ
चाहे  पशिचम में

Rajni Vijay Singla

 

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कब तक झेले खून की होली ?

कब तक बने रहेंगे गूंगे बहरे ?
हैवानियत के सहके जख्म गहरे
मासूमों के खून से खेले होली
कब तक चलेगी बारुद गोली ?
दहशतपंथी के बढ़ रहे हौंसले
बिखर रहे बेगुनाहो के घौंसले
इंसानियत होती जा रही ओझल
जाने कौन सा पल हो मौत की आंधी ?
सकून से जीना  हो गया बोझिल

Rajni Vijay Singla

 

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