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कुदरत से कर लो यारी

बेवक्त बेवजह बहता है जब पानी ।

लहूलहुान होती है कुदरत रुहानी ।

लगता है मुझे कुछ -कुछ ऐसे ।

कोस रहा हो कोई प्यासा जैसे ।

करता- कतरा न दो विरासत ।

बचत होती है अच्छा आदत ।

कल के लिए बचा लो पानी ।

जल बिन, नादानों  क्या जिंदगानी  ?

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Posted by on December 1, 2016 in poetry

 
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दोस्ताना हमारा कयामत से कयामत तक

 
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Posted by on November 30, 2016 in poetry

 

समझाया किसी ने ।

दरद देने वालों पे क्यूं आता है हमे प्यार ?

समझाया हमे किसी ने इंसानियत यही यार ।

हर मजहब की सीख ये, समय की भी पुकार ।

समझ गया जो , जीता मन , जीता सब संसार

 
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Posted by on November 7, 2016 in poetry

 

बस इतना ही जानूं !

परीत की रीत क्या होती,

न जानूं ,न पहचानूं ।

सांसे मेरी तेरे सदके ,

तुझको ही रब मानूं ।

 

 
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Posted by on October 24, 2016 in poetry

 

ओर पराई क्या करना ?

बेटियां तो होती पहले ही पराई ।

ओर पराई क्या करना ?

बैर कर कभी हुआ भला न ।

बैर बढ़ा कर क्या करना ।

परायो को अपना करने वालो !

गैर बना कर क्या करना ।

 प्यार  के सागर बन जाओ ।

ज़हर चढ़ा कर क्या करना ।

 
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Posted by on October 22, 2016 in poetry

 

काश ऐसा होता ।

इंसानियत की तलब लगा दे ।

काश ! ऐसा कोई मैखाना होता ।

कौन अपना ? कौन पराया ?

नापने का पैमाना होता ।

नफरत के सायों से दूर ।

प्यार का आशियाना होता । 

नया दौर है दहशत का।

काश दौर पुराना होता।

 
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Posted by on October 20, 2016 in poetry

 

ऐ चांद ! कहूं कुछ तुझसे ।

तेरा इंतजार भी हसीन ।

तेरा दीदार भी हसीन ।

बुरा मत मनाना चांद ।

 मेरा दिलदार भी हसीन।

मिलेगा न जवाब उस सा।

नाही आसमां नाही ज़मीन ।

पास रहके भी है पास।

दूर रहके भी वो करीब ।

 
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Posted by on October 19, 2016 in poetry

 
 
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