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Tag Archives: अनुशासन. चीरहरण

अपनों के तीर

अपनों के तीर

अपने जब दरद देते इन्तेहा
पराये तब ये कहते हंसके हम पे
बेहद नाज करते थे तुम जिन पे


आज वही जुबां खामोश रुह घायल
मन का भिगो गये कोना – कोना ।

अश्क छुपाले और छुपाले रोना

किसको दिखायेगा दरद को ढोना ?

 

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कुदरत

न किसी फरमान , न एहसान की मोहताज होती है

कुदरत तो खुद खजानों से , सजा ताज होती है

आदिकाल से ले अब तक , लगे सुलझाने जिसे

गुत्थियाँ कई है उलझी हुई , वो राज़ होती है

तय किया इसने , अपनी रहमतों-नेमतों का समां

अनुशासन की धुन से सजा साज होती है

कभी नाज़ होती है , कभी हमराज़ होती है

चीरहरण करते हम जब इसका , प्रदुषण बन

सैलाब, जलजला, सुनामी बन नाराज़ होती है

चहकते बड़े पशु पक्षी , महकते बेल बूते बहुत

सावन बसंत बन , जब आगाज़ होती हैं

शर्मीली बड़ी ओढ़े हुए , ओज़ोन की चुनरी यह

न छेड़ो खेंचो चुनरी , वही इसकी लाज होती है

रजनी विजय सिंगला

Email: rajnivijaysingla@gmail.com

 
2 Comments

Posted by on September 16, 2012 in poetry

 

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