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Tag Archives: कुदरत

मुरादों का मेला

मां बैठी है भर के झोली
मुरादों से भर लो भक्तों

मुरादो का है मेला
भक्तों का है रेला
मां की है रहमत
संभाले सब झमेला

मां ही साथी दिन राती

मां ही है सखी सहेला

मैया दे ममता के साये

रहने न दे कभी अकेला

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रब को बना ले मितवा

रब से बड़ा  कोई मीत नही
अरदास से बेहतर गीत नही
याद तो करके देख जरा
कर देगा तुझे हरा भरा
खुदाई से उसकी प्यार कर
दिल से जरा फरियाद कर
हर रुह में  वही तो बसता है
इंसानियत हंसे तो संग हंसता है
शुभ करमन सच्ची इबादत है
बुराई का संग,खुदाये- बगावत है

Rajni Vijay Singla

 

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कुदरत

न किसी फरमान , न एहसान की मोहताज होती है

कुदरत तो खुद खजानों से , सजा ताज होती है

आदिकाल से ले अब तक , लगे सुलझाने जिसे

गुत्थियाँ कई है उलझी हुई , वो राज़ होती है

तय किया इसने , अपनी रहमतों-नेमतों का समां

अनुशासन की धुन से सजा साज होती है

कभी नाज़ होती है , कभी हमराज़ होती है

चीरहरण करते हम जब इसका , प्रदुषण बन

सैलाब, जलजला, सुनामी बन नाराज़ होती है

चहकते बड़े पशु पक्षी , महकते बेल बूते बहुत

सावन बसंत बन , जब आगाज़ होती हैं

शर्मीली बड़ी ओढ़े हुए , ओज़ोन की चुनरी यह

न छेड़ो खेंचो चुनरी , वही इसकी लाज होती है

रजनी विजय सिंगला

Email: rajnivijaysingla@gmail.com

 
2 Comments

Posted by on September 16, 2012 in poetry

 

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