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Tag Archives: गरीब

अपनों के तीर

अपनों के तीर

अपने जब दरद देते इन्तेहा
पराये तब ये कहते हंसके हम पे
बेहद नाज करते थे तुम जिन पे


आज वही जुबां खामोश रुह घायल
मन का भिगो गये कोना – कोना ।

अश्क छुपाले और छुपाले रोना

किसको दिखायेगा दरद को ढोना ?

 

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कमी की कीमत

दाने की कीमत  भूखा  ही जाने ।
प्यास की कदर, प्यासा पहचाने ।
प्यार   के क्या मोल है होता ?
दरद सहा हो , सहे हो जिसने ताने
राजसी लोग फुटपाथ से अनजाने
भरे-पूरे  क्या त्याग -रहम को  माने
वैभव तले रौंदे रोज गरीब के दाने

 

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दरद से निजात

खुदा ही केवल दरद से निजात दे सकता है
दुआए ,दरद को काफी हद कम कर सकती है
खुदा की बंदगी,, बंदे को हौंसले दे सकती है खुदा के इंसाफ में बस विश्वास बनाये रखे
दरद रफ्ता-रफ्ता रफूचक्कर हो ही जायेगा
खुदा के बेहद करीब ले जायेगा तोहे बंदे
खुद ब खुद छुट जायेगे माड़े सब धंधे

 

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दुआए काम कर गई

यकीन था हमे इबादत रंग लायेगी
दुआओ की इबारत जरुर हंसायेगी
खुशियो की दस्तक ने  मन हरा कर दिया
दुआए अनमोल खजाना होती है
विश्वास ओर ज्यादा पक्का किया

Rajni Vijay Singla

 

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हाय रुलाया प्याजों ने

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यह  कैसी आजादी

महंगाई ने की बर्बादी

प्याज आसमान पे पंहुचा

गरीब ने  अपना पेट  नोचा

अमीर भरे lockers में

गरीब रोटी की ठोकरों में

प्याज सोने के भाव हुआ

पेट भरना हराम हुआ

Blackmailers’ का काम हुआ

वतन फिर बदनाम हुआ

मेहमान न आये घर कोई

गरीब करे बस यही दुआ

रजनी विजय सिंगला

Email: rajnivijaysingla@gmail.com

 
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Posted by on August 14, 2013 in message, poetry

 

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