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Tag Archives: रजनी विजय सिंगला

बायनाः ढाई अक्षर प्रेम का काफी है

बायनाः ढाई अक्षर प्रेम का काफी है

सास भी कभी बहू ही थी

कल की बहू ,आज सासु रानी

घर घर की है यही कहानी

यह रीत तो सदियों पुरानी

करवा चौथ देखो दोनो मनाती

मेंहदी रचाती, चूड़ी खनकाती

सुहाग के गीत गाती

तारो की घनी छाँव मे

दोनों ने बड़े ही चाव मे

खाई करवे का गरी सरगी

शाम सुनाई सासु ने करवे की कहानी

बायने की थाली सजा के लाई बहूरानी

पाँव छूकर बायना देवे बहूरानी

गले लगाके बड़े आस से

बहू से यह कहा ,सास ने:

( मेरे लाल की तू लालिमा

मेरे चाँद की तू है चांदनी

उसकी मल्लिका, उसकी रानी

बायने मे चाहिए केवल ,बिटिया रानी!

बस ढाई अक्षर प्रेम के ,गृहलक्ष्मी !तू सुहानी !

ढाई अक्षर प्रेम के

ढाई अक्षर प्रेम के

काफी है ,काफी है

जिंदगी प्यार की

मुस्कान व दुलार की

काफी है, काफी है

क्योंकि (प्यार ) होता है जंहा

( मिठास )आ जाती है वंहा

प्यार ही काफी है ,काफी है।

 

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गऊ समान कन्या

नवरात्रा के उपलक्ष्य में बेटियाँ बचाने की शपथ ही सच्चा पूजन है .

करते है जिसकी डोली विदा, रक्त उस का बहाना न चाहिए

कन्या तो गऊ समान है, वध उस का करना न चाहिए

तुम भी तो किसी की  बेटी हो, फिर क्यों सुख की तुम सांस भरो ?

छीन सांसें बेटी के हक की, पाप सर पे चढ़ाना न चाहिए

करते है जिसकी डोली विदा, लहू उस का बहाना न चाहिए

ज़रा सोच करो द्रिष्टि धर के, न काटो सृष्टि को जड़ से

कर कन्या हत्या-एक नीच कर्म, जन्म अपना गवाना न चाहिए

पढले बेटी तभी चेहरा, बेटी हर मन की बात सुने

चले वंश बस बेटे से, इस भ्रम में आना न चाहिए

करते है जिसकी डोली विदा, रक्त उस का बहाना न चाहिए

बेशक न जिमाओ, तुम कंजक, न पूजो चाहे कोई देवी

अपने घर आती कन्या को, मृत्युद्वार दिखाना न चाहिए

करते है जिसकी डोली विदा, लहू उसका बहाना न चाहिए . .

रजनी विजय सिंगला, यह गुज़ारिश करती है . .

 
6 Comments

Posted by on October 21, 2012 in poetry

 

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बधाई बधाई . .

यह बधाई आशीर्वाद के तौर पर मेरे भाइयो के नए शोरूम ” Lovely Marbles”

के उपलक्ष्य पर लिखी और गाई गई है

जैसे गणपति जी ने उनकी इच्छा पूरी की है वैसे ही गणपति जी सब की इच्छा और महत्वकांषा पूरी करे

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Posted by on September 19, 2012 in poetry

 

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