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Tag Archives: Kabir

सूफी की परिभाषा

सूफी गीत मायने जब  नयन बरसे
तू ही तू बस तेरे  ही चरचे
आवाज बजाये इश्क का साज
आशिकी पे हो बेहद नाज
सूफी रीत माने जब रुह हरषे
परमात्म परीत को आत्म तरसे
पावन हो जाये पाप के डर से
खुदा सखा अपना ,अनमोल सकून
रब की  आरजू ,अरमाने जूनून

Rajni Vijay Singla

 

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कुकर्मी संत की रासलीला

कहाँ मर्यादा पुर्शोतम राम

कहाँ बापू आसाराम

राम नाम को किया बदनाम

रावन से भे बदतर काम

बलात्कार कर सत्संग करे

आत्म आवाज़ को भंग करे

बलात्कार के बाद नातिन कहे

रहें सहे संस्कार वो भे बहे

चेले चपेटे लाखों में

पट्टी बांधें आँखों पे

पापी को बापू कहे नादान भूलो में

बलात्कारी आहंकारी बापू झूलो में

शिकारी बेबस अकेली शूलों में

कानून करे बुलंद आवाज़

बलात्कार से मुक्त करे समाज

शिकार को नहीं शिकारी को मारे

नारी को नहीं बलात्कारी को मारें

रजनी विजय सिंगला

 
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Posted by on August 26, 2013 in message, poetry

 

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