RSS

Tag Archives: mine

अभिनंदन का अभिनंदन

अभिनंदन का अभिनंदन

 

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

मुबारक मुबारक मुबारक

मुबारक !मुबारक! मुबारक!मुबारक ।
भक्त को भगवान का दुलार मुबारक ।
भूखे को रोटी,  अधनंगे को कपड़ा
प्यासे को पानी की धार मुबारक ।
खेतों को बरखा की बहार मुबारक ।
दिल को प्यार का इज़हार मुबारक । 
सरहदों को अमन ऐ एतबार मुबारक ।
राही को मंजिल की पुकार मुबारक ।
योद्धा को धनुष – तलवार मुबारक ।
जंगलो को हरियल सा हार मुबारक ।
मुसाफिर को पेड़ की छांव मुबारक । 
भारत को स्वच्छता का पैगाम मुबारक ।
किसान को अनाज का दाम मुबारक ।
पंछी को अपना दाना-पानी मुबारक ।
बचपन को नानी की कहानी मुबारक ।
मरते को स्वस्थ जिंदगानी मुबारक ।
सुबह के भूले को  है शाम मुबारक ।
आंचल मे बेटी,  हर अंगना में पौधे ,
मां भारती को ऐसी शान मुबारक ।

 

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

Chat

बेजुबान हुं पर गुमराह नही

मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नही ।
मैं तो वक्त को तवज्जो देता हूं ।
दरद जमाने तेरे सारे मैं सहता हूं ।
कुछ कहना गर बस उसे कहता हूं ।
जो फैसले वक्त ही तय करता है ।
जाने बंदा उसमे क्यूं अड़ता है ?
मेरी खामोशी की वजह क्या है ?
क्योंकि जाने वो ही, रज़ा क्या है ?
बंदे की औकात कंहा न्याय सुनाने की ।
नेकी – बदी पर मुहरें अपनी लगाने की ।
कथनी-करनी के फल, रब के हाथ सारे ।
कल आज व कल , वो ! बिगाड़े या संवारे ।
नैया थमा दो उसको ,वो ही तारे वो उबारे ।
क्युं बदजुबानी ? जब वक्त जवाब दे सारे

 

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

पानी है तो जिंदगानी है

पानी बना नही सकता , बचा तो सकता है
जाया करने वालो को समझा तो सकता है
लातुर नही बनना,प्यास का एहसास भयंकर
बिन पानी सब सूना, नींद से जगा तो सकता है
पानी की करो निगरानी, तभी वजूद जिंदगानी वरना मिट जायेगा नामोनिशां ,हमारी कहानी
पानी संग कल है, वरना सब उन्नति विफल है

 

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

चलना जरुरी

चलेगें हम जितना ज्यादा
होगा उतना हमको फायदा
न छूयेगी पायेगी बीमारी हमको
न ही तन की लाचारी हमको
कर लो खुद से पक्का वायदा
अटूट संकल्प, अचल इरादा

 

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

क्या महफूज़ आज भी दामिनयो का दामन ?

दामिनयों का दामन आज भी न महफूज़ क्यूं?
अस्मत पे नापाक निगाहे, पाप की भूख क्यूं ?
तीन बरस बाद भी सिलसिले वही बरकरार है
रोज नई दामिनी सिसकती,हो रहा तिरस्कार है
नाबालिगी  ठप्पे से उड़ने को तैयार दरिंदा वह
इंसानियत का शिकारी क्यूं  आजाद परिंदा वह
हैवानियत में मसरुफ ,शिकार की आस में
कानून बेबस मजबूर, हदों की फांस में
मोमबतियां  जलाने से न तुफान बुझ पायेंगे
रुकेंगे तभी , वहशी सरेआम फांसी  खायेंगे
पाप कानून से बड़ा क्यूं ?
न्याय  चुपचाप खड़ा क्यूं ?
रब के इंसाफ पे बस बचा एतबार है
ओर बड़े दरदेमंजर का शायद इंतजार है
तभी बेहद बेबस कानून है
न्याय डाले बैठा हथियार है

Rajni Vijay Singla

 

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

Image

भारतीय कला कमाल है

<a href="https://hindipoetryworld.files.wordpress.com/2015/11/

मन में घर करती कलाये
शिंगार कीआवाज ये अदाये
सरहदे भी करती सिजदा
कला की न होती सीमाऐ
मजहब से न कोई वास्ता
खुद ढूंढ लेती अपना रास्ता
मै दीवानी खुद कला की
जिसने नवाजी कलाकारी हमको
करु इबादत उस नूरेअल्लाह की

Rajni Vijay Singla

 

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

 
%d bloggers like this: