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हाय रुलाया प्याजों ने

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यह  कैसी आजादी

महंगाई ने की बर्बादी

प्याज आसमान पे पंहुचा

गरीब ने  अपना पेट  नोचा

अमीर भरे lockers में

गरीब रोटी की ठोकरों में

प्याज सोने के भाव हुआ

पेट भरना हराम हुआ

Blackmailers’ का काम हुआ

वतन फिर बदनाम हुआ

मेहमान न आये घर कोई

गरीब करे बस यही दुआ

रजनी विजय सिंगला

Email: rajnivijaysingla@gmail.com

 
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Posted by on August 14, 2013 in message, poetry

 

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कुदरत

न किसी फरमान , न एहसान की मोहताज होती है

कुदरत तो खुद खजानों से , सजा ताज होती है

आदिकाल से ले अब तक , लगे सुलझाने जिसे

गुत्थियाँ कई है उलझी हुई , वो राज़ होती है

तय किया इसने , अपनी रहमतों-नेमतों का समां

अनुशासन की धुन से सजा साज होती है

कभी नाज़ होती है , कभी हमराज़ होती है

चीरहरण करते हम जब इसका , प्रदुषण बन

सैलाब, जलजला, सुनामी बन नाराज़ होती है

चहकते बड़े पशु पक्षी , महकते बेल बूते बहुत

सावन बसंत बन , जब आगाज़ होती हैं

शर्मीली बड़ी ओढ़े हुए , ओज़ोन की चुनरी यह

न छेड़ो खेंचो चुनरी , वही इसकी लाज होती है

रजनी विजय सिंगला

Email: rajnivijaysingla@gmail.com

 
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Posted by on September 16, 2012 in poetry

 

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