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Tag Archives: TERRORIST

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दरद देखा नही जाता

किसी की बदनसीबी पे ।
कमी, मजबूरी व गरीबी पे।
कभी देख के बेरोजगारी।
कभी भूख,कभी बीमारी।
कभी मौत ,  कंही सौत
तिल-तिल जीने की लाचारी ।
देख रुक जाते हैं कदम।
रोती अखियां ,हा़ए! इतने गम ।
मेरी मान, जग गमे आजाद कर।
खुशियो की तू इतनी बरसात कर ।
भीग जाये  खुदा! तेरी  खुदाई ।
मिट जाये गम,  अश्क व जुदाई

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बेजुबान हुं पर गुमराह नही

मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नही ।
मैं तो वक्त को तवज्जो देता हूं ।
दरद जमाने तेरे सारे मैं सहता हूं ।
कुछ कहना गर बस उसे कहता हूं ।
जो फैसले वक्त ही तय करता है ।
जाने बंदा उसमे क्यूं अड़ता है ?
मेरी खामोशी की वजह क्या है ?
क्योंकि जाने वो ही, रज़ा क्या है ?
बंदे की औकात कंहा न्याय सुनाने की ।
नेकी – बदी पर मुहरें अपनी लगाने की ।
कथनी-करनी के फल, रब के हाथ सारे ।
कल आज व कल , वो ! बिगाड़े या संवारे ।
नैया थमा दो उसको ,वो ही तारे वो उबारे ।
क्युं बदजुबानी ? जब वक्त जवाब दे सारे

 

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कब तक झेले खून की होली ?

कब तक बने रहेंगे गूंगे बहरे ?
हैवानियत के सहके जख्म गहरे
मासूमों के खून से खेले होली
कब तक चलेगी बारुद गोली ?
दहशतपंथी के बढ़ रहे हौंसले
बिखर रहे बेगुनाहो के घौंसले
इंसानियत होती जा रही ओझल
जाने कौन सा पल हो मौत की आंधी ?
सकून से जीना  हो गया बोझिल

Rajni Vijay Singla

 

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दर्द को दावत

दर्द को दावत

सोचा था हिरोशिमा दिवस पर

शांति के फ़रिश्ते आयेंगे

नामालुम था सरहदों पे मासूम मारे जायंगे

एक ही माँ के दो हिस्से

फिर क्यूं हिंसा के किस्से

बेवजह दोहराये जायंगे

दर्दे बादल आयेंगे

अशांति बरसायंगे

 

रजनी विजय सिंगला

 
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Posted by on August 6, 2013 in poetry

 

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